Friday, 4 March 2016

रानी मलिनहा का सलाह


                                                रानी मलिनहा का सलाह:-

अब सलाह-मशविरा होने लगा कि पृथ्वीराज से क्योंकर मुकाबिला किया जाये। रानी मलिनहा भी इस मशविरे में शरीक थीं। किसी ने कहा, महोबे के चारों तरफ एक ऊँची दीवार बनायी जाय ; कोई बोला, हम लोग महोबे को वीरान करके दक्खिन को ओर चलें। परमाल जबान से तो कुछ न कहता था, मगर समर्पण के सिवा उसे और कोई चारा न दिखाई पड़ता था। तब रानी मलिनहा खड़ी होकर बोली :
‘चन्देल वंश के राजपूतो, तुम कैसी बच्चों की-सी बातें करते हो? क्या दीवार खड़ी करके तुम दुश्मन को रोक लोगे? झाडू से कहीं ऑंधी रुकती है ! तुम महोबे को वीरान करके भागने की सलाह देते हो। ऐसी कायरों जैसी सलाह औरतें दिया करती हैं। तुम्हारी सारी बहादुरी और जान पर खेलना अब कहॉँ गया? अभी बहुत दिन नहीं गुजरे कि चन्देलों के नाम से राजे थर्राते थे। चन्देलों की धाक बंधी हुई थी, तुमने कुछ ही सालों में सैंकड़ों मैदान जीते, तुम्हें कभी हार नहीं हुई। तुम्हारी तलवार की दमक कभी मन्द नहीं हुई। तुम अब भी वही हो, मगर तुममें अब वह पुरुषार्थ नहीं है। वह पुरुषार्थ बनाफल वंश के साथ महोबे से उठ गया। देवल देवी के रुठने से चण्डिका देवी भी हमसे रुठ गई। अब अगर कोई यह हारी हुई बाजी सम्हाल सकता है तो वह आल्हा है। वही दोनों भाई इस नाजुक वक्त में तुम्हें बचा सकते हैं। उन्हीं को मनाओ, उन्हीं को समझाओं, उन पर महोते के बहुत हक हैं। महोबे की मिट्टी और पानी से उनकी परवरिश हुई है। वह महोबे के हक कभी भूल नहीं सकते, उन्हें ईश्वर ने बल और विद्या दी है, वही इस समय विजय का बीड़ा उठा सकते हैं।’
रानी मलिनहा की बातें लोगों के दिलों में बैठ गयीं।
जगना भाट आल्हा और ऊदल को कन्नौज से लाने के लिए रवाना हुआ। यह दोनों भाई राजकुँवर लाखन के साथ शिकार खेलने जा रहे थे कि जगना ने पहुँचकर प्रणाम किया। उसके चेहरे से परेशानी और झिझक बरस रही थी। आल्हा ने घबराकर पूछा—कवीश्वर, यहॉँ कैसे भूल पड़े? महोबे में तो खैरियत है? हम गरीबों को क्योंकर याद किया?
जगना की ऑंखों में ऑंसू भर जाए, बोला—अगर खैरियत होती तो तुम्हारी शरण में क्यों आता। मुसीबत पड़ने पर ही देवताओं की याद आती है। महोबे पर इस वक्त इन्द्र का कोप छाया हुआ है। पृथ्वीराज चौहान महोबे को घेरे पड़ा है। नरसिंह और वीरसिंह तलवारों की भेंट हो चुके है। सिरकों सारा राख को ढेर हो गया। चन्देलों का राज वीरान हुआ जाता है। सारे देश में कुहराम मचा हुआ है। बड़ी मुश्किलों से एक महीने की मौहलत ली गई है और मुझे राजा परमाल ने तुम्हारे पास भेजा है। इस मुसीबत के वक्त हमारा कोई मददगार नहीं है, कोई ऐसा नहीं है जो हमारी किम्मत बॅंधाये। जब से तुमने महोबे से नहीं है, कोई ऐसा नहीं है जो हमारी हिम्मत बँधाये। जब से तुमने महोबे से नाता तोड़ा है तब से राजा परमाल के होंठों पर हँसी नहीं आई। जिस परमाल को उदास देखकर तुम बेचैन हो जाते थे उसी परमाल की ऑंखें महीनों से नींद को तरसती हैं। रानी महिलना, जिसकी गोद में तुम खेले हो, रात-दिन तुम्हारी याद में रोती रहती है। वह अपने झरोखें से कन्नैज की तरफ ऑंखें लगाये तुम्हारी राह देखा करती है। ऐ बनाफल वंश के सपूतो ! चन्देलों की नाव अब डूब रही है। चन्देलों का नाम अब मिटा जाता है। अब मौका है कि तुम तलवारे हाथ में लो। अगर इस मौके पर तुमने डूबती हुई नाव को न सम्हाला तो तुम्हें हमेशा के लिए पछताना पड़ेगा क्योंकि इस नाम के साथ तुम्हारा और तुम्हारे नामी बाप का नाम भी डूब जाएगा।
आल्हा ने रुखेपन से जवाब दिया—हमें इसकी अब कुछ परवाह नहीं है। हमारा और हमारे बाप का नाम तो उसी दिन डूब गया, जब हम बेकसूर महोबे से निकाल दिए गए। महोबा मिट्टी में मिल जाय, चन्देलों को चिराग गुल हो जाय, अब हमें जरा भी परवाह नहीं है। क्या हमारी सेवाओं का यही पुरस्कार था जो हमको दिया गया? हमारे बाप ने महोबे पर अपने प्राण न्यौछावर कर दिये, हमने गोड़ों को हराया और चन्देलों को देवगढ़ का मालिक बना दिया। हमने यादवों से लोहा लिया और कठियार के मैदान में चन्देलों का झंडा गाड़ दिया। मैंने इन्ही हाथों से कछवाहों की बढ़ती हुई लहर को रोका। गया का मैदान हमीं ने जीता, रीवॉँ का घमण्ड हमीं ने तोड़ा। मैंने ही मेवात से खिराज लिया। हमने यह सब कुछ किया और इसका हमको यह पुरस्कार दिया गया है? मेरे बाप ने दस राजाओं को गुलामी का तौक पहनाया। मैंने परमाल की सेवा में सात बार प्राणलेवा जख्म खाए, तीन बार मौत के मुँह से निकल आया। मैने चालीस लड़ाइयॉँ लड़ी और कभी हारकर न आया। ऊदल ने सात खूनी मार्के जीते। हमने चन्देलों की बहादुरी का डंका बजा दिया। चन्देलों का नाम हमने आसमान तक पहुँचा दिया और इसके यह पुरस्कार हमको मिला है? परमाल अब क्यों उसी दगाबाज माहिल को अपनी मदद के लिए नहीं बुलाते जिसकों खुश करने के लिए मेरा देश निकाला हुआ था !
जगना ने जवाब दिया—आल्हा ! यह राजपूतों की बातें नहीं हैं। तुम्हारे बाप ने जिस राज पर प्राण न्यौछावर कर दिये वही राज अब दुश्मन के पांव तले रौंदा जा रहा है। उसी बाप के बेटे होकर भी क्या तुम्हारे खून में जोश नहीं आता? वह राजपूत जो अपने मुसीबत में पड़े हुए राजा को छोड़ता है, उसके लिए नरक की आग के सिवा और कोई जगह नहीं है। तुम्हारी मातृभूमि पर बर्बादी की घटा छायी हुई हैं। तुम्हारी माऍं और बहनें दुश्मनों की आबरु लूटनेवाली निगाहों को निशाना बन रही है, क्या अब भी तुम्हारे खून में जोश नहीं आता? अपने देश की यह दुर्गत देखकर भी तुम कन्नौज में चैन की नींद सो सकते हो?
देवल देवी को जगना के आने की खबर हुई। असने फौरन आल्हा को बुलाकर कहा—बेटा, पिछली बातें भूल जाओं और आज ही महोबे चलने की तैयारी करो।
आल्हा कुछ जबाव न दे सका, मगर ऊदल झुँझलाकर बोला—हम अब महोबे नहीं जा सकते। क्या तुम वह दिन भूल गये जब हम कुत्तों की तरह महोबे से निकाल दिए गए? महोबा डूबे या रहे, हमारा जी उससे भर गया, अब उसको देखने की इच्छा नहीं हे। अब कन्नौज ही हमारी मातृभूमि है।
राजपूतनी बेटे की जबान से यह पाप की बात न सुन सकी, तैश में आकर बोली—ऊदल, तुझे ऐसी बातें मुंह से निकालते हुए शर्म नहीं आती ? काश, ईश्वर मुझे बॉँझ ही रखता कि ऐसे बेटों की मॉँ न बनती। क्या इन्हीं बनाफल वंश के नाम पर कलंक लगानेवालों के लिए मैंने गर्भ की पीड़ा सही थी? नालायको, मेरे सामने से दूर हो जाओं। मुझे अपना मुँह न दिखाओं। तुम जसराज के बेटे नहीं हो, तुम जिसकी रान से पैदा हुए हो वह जसराज नहीं हो सकता।

यह मर्मान्तक चोट थी। शर्म से दोनों भाइयों के माथे पर पसीना आ गया। दोनों उठ खड़े हुए और बोले- माता, अब बस करो, हम ज्यादा नहीं सुन सकते, हम आज ही महोबे जायेंगे और राजा परमाल की खिदमत में अपना खून बहायेंगे। हम रणक्षेत्र में अपनी तलवारों की चमक से अपने बाप का नाम रोशन करेंगे। हम चौहान के मुकाबिले में अपनी बहादुरी के जौहर दिखायेंगे और देवल देवी के बेटों का नाम अमर कर देंगे। 

महोवा का युद्ध

                                                    महोवा का युद्ध:-

 इतिहास में महोवा का युद्ध होने का सही सही कारण नहीं मिलता है पर रासो में लिखा है की चौहान सेना मुहम्मद गौरी से सफल युद्ध जीत कर दिल्ली वापस आ रही थी, उनमे कितने ही घायल सैनिक थे, ये सेना कई रास्तों से दिल्ली वापस जा रही थी। कुछ घायल सेना की टुकरी महोवा राज्य जा पहुंची। वर्षा ऋतू थी तथा रात अँधेरी थी, पृथ्वीराज के सैनिक आश्रय पाने के उदेश्य से यहाँ वहां भटककर चंदेल राजाओं के शाही बाग़ में जा पहुंचे, पृथ्वीराज के सैनिकों को बाग़ के रक्षकों ने रोका परन्तु वे उनकी बात न मान कर राजा परमार के सरकारी महल में डेरा डालने लगे, बात बढ़ गयी। एक सैनिक ने एक रक्षक को मार डाला, बात राजा परमार तक पहुँच गयी, राजा परमार ने हरिदास बघेल को आदेश दिया की घायल सैनिकों को पकड़ कर यहाँ पेश किया जाए। चौहान सैनिकों ने हरिदास को बहुत तरह से समझाना चाहा की वे सुबह चले जायेंगे पर हरिदास एक न माना, परिणाम ये हुआ की बात ही बात में हरिदास और उसके कुछ सैनिक ने चौहान सेना पर हमला कर दिया, चौहान सेना घायल अवास्था में ही लड़ने लगी और हरिदास मारा गया, जब परमार को हरिदास के मौत की खबर मिली तब परमार ने उदल को बुला कर सभी घायल सैनिकों को मार डालने की आज्ञा दी, उदल ने बहुत समझाने की कोशिश की कि पृथ्वीराज बहुत वीर और प्रतापी है उनसे झगडा मोल न लिया जाए, पर राजा परमार के सामंत मल्हन ने आल्हा उदल की बात को जमने न दिया, राजा की आज्ञा पाकर आल्हा उदल को बाग़ में जाकर सभी घायल सैनिकों को मार डालना पड़ा। अब यहाँ पर आल्हा उदल का परिचय देना अवश्यक है। परमार देव की सेना में दसराज नामक एक सरदार था। आल्हा उदल उसी के दो पुत्र थे। इनके पिता ने कितनी ही बार युद्ध में प्रकारम दिखा कर महोवा को विजयी बनाया था। ये दोनों भाई भी बहुत परकर्मी थे, इन्हें महोवा का मशहूर लड़ाका भी कहा जाता था, कहा जाता था की आज तक पृथ्वी में ऐसा कोई पैदा नहीं हुआ है जो इन दो भाइयों को हरा सके, उनके इन पराक्रम के कारण परमार इन्हें अपने पुत्र के जैसा मानते थे। उनका इतना बल देखकर राज्य के अन्य कर्मचारी उनसे जलते थे। आल्हा उदल के पास अच्छे नस्ल के पांच घोड़े थे जो की उनके पिता की आखिरी निशानी थे, लोगो ने राजा के कान भरे की ऐसा घोडा तो केवल महोवा के राजा के पास होने चाहिए, राजा परमार ने कुछ धन के बदले वो घोडा लेना चाहा पर आल्हा ने वो घोडा उन्हें न देना चाहा, इसपर राजा के सामंतों ने फिर से राजा के कान भरने लगे और राजा ने क्रोध में आकर उन्हें राज्य से निकलवा दिया। आल्हा उदल ने वहां रहना उचित न समझा और कन्नोज में जयचंद के पास शरणागत के रूप में आ गए। जयचंद वीरों की इज्ज़त करना अच्छी तरह से जनता था उसने उन्दोनो भाइयों को पुरे सम्मान के साथ कन्नोज में रखा। जब पृथ्वीराज को यह दिल तोड़ने वाली खबर मिली तो उसके गुस्से की कोई हद न रही। ऑंधी की तरह महोबे पर चढ़ दौड़ा और सिरको, जो इलाका महोबे का एक मशहूर कस्बा था, तबाह करके महोबे की तरह बढ़ा। चन्देलों ने भी फौज खड़ी की। मगर पहले ही मुकाबिले में उनके हौसले पस्त हो गये। आल्हा-ऊदल के बगैर फौज बिन दूल्हे की बारात थी। सारी फौज तितर-बितर हो गयी। देश में तहलका मच गया। अब किसी क्षण पृथ्वीराज महोबे में आ पहुँचेगा, इस डर से लोगों के हाथ-पॉँव फूल गये। परमाल अपने किये पर बहुत पछताया। मगर अब पछताना व्यर्थ था। कोई चारा न देखकर उसने पृथ्वीराज से एक महीने की सन्धि की प्रार्थना की। चौहान राजा युद्ध के नियमों को कभी हाथ से न जाने देता था। उसकी वीरता उसे कमजोर, बेखबर और नामुस्तैद दुश्मन पर वार करने की इजाजत न देती थी। इस मामले में अगर वह इन नियमों को इतनी सख्ती से पाबन्द न होता तो शहाबुद्दीन के हाथों उसे वह बुरा दिन न देखना पड़ता। उसकी बहादुरी ही उसकी जान की गाहक हुई। उसने परमाल का पैगाम मंजूर कर लिया। चन्देलों की जान में जान आई।

संयोगिता प्रेम प्रसंग

                                                                संयोगिता प्रेम प्रसंग:-

 जिस समय ये समाचार जयचंद को मिला जयचंद क्रोध से पागल हो उठा। उसने तुरंत ही अपने मंत्री को सेना तयार करने की आज्ञा दी, यह समाचार सुनते ही चारों ओर सन्नाटा छा गया। जयचंद की रानी को जब ये समाचार मिला तब तब उसने जयचंद को बहुत तरह से समझाया और कहा की पहले संयोगिता का स्वयंबर कर ले बाद में पृथ्वीराज से युद्ध कर ले, क्योंकि इस समय पूरे भारत भर से नरेश उपस्थित है। ये समाचार संयोगिता को मालूम हुए। संयोगिता पहले से ही पृथ्वीराज की कृति सुनकर उन पर आसक्त हो रही थी, ये समाचार सुनकर वो बहुत दुखित हुई। धीरे धीरे उसके मन में पृथ्वीराज के प्रति प्रेम का बीज फूट पड़ा, और ये अंकुर कितनो ने ही देखा, जयचंद की रानी ने जयचंद को साडी बातें बता दी, जयचंद ने संयोगिता को बहुत समझाने की कोशिश की, परन्तु संयोगिता ने अपने सहेलियों से स्पष्ट कह दिया था की मैं दुसरे का वरण न करुँगी, दूती ने यह बात जयचंद से जा कही ये सुनकर जयचंद क्रोध से अधीर हो उठा। और जब स्वयंबर का समय आया तब संयोगिता ने द्वारपाल बने पृथ्वीराज के स्वर्ण प्रतिमा में स्वयबर हार डाल दिया, वहां उपस्थित सभी राजा और राजकुमार अपना अपमान समझ कर तुरंत वहां से चले गए, जयचंद ये देख कर उसकी गुस्सा का ठिकाना न रहा और उसने राजकुमारी संयोगिता को गंगा किनारे एक महल में कैद करवा दिया अब उसने पृथ्वीराज को मारकर निश्चिंत होना ही उचित समझा औ मन ही मन सोचा की पृथ्वीराज को मार डालने से संयोगिता उसके बारे में सोचना बंद कर देगी और और विवाह के लिए राजी हो जाएगी। उस समय वो ये क्रोध के कारण भूल गया था की एक राजपूत की बाला अपने प्राण दे सकती है पर अपना हठ नहीं छोड़ सकती है। पृथ्वीराज को ये सभी खबर मालूम हुए, और संयोगिता को पाने की इच्छा उनमे बलवंत हो उठी, पर तुरंत उस समय उन्होंने कुछ नहीं किया. पृथ्वीराज के इच्छानुसार यज्ञ तो विध्वंस हो ही गया था, अब कन्नोज की सेना पृथ्वीराज पर आक्रमण करने हेतु दिल्ली की ओर अग्रसर हुई, उसने दिल्ली के सीमावर्ती इलाकों में उपद्रव मचाना शुरू कर दिया और कई क्षेत्रों में अधिकार कर गावों को लूटने लगे। जब पृथ्वीराज को ये समाचार मिला तब उसकी सेना उन गावों की तरफ अग्रसर हुई और आसानी से जयचंद की सेना को मार भगाया। रासो में लिखा है की शहाबुद्दीन की माता कितनी ही बेगमों के साथ मक्के की यात्रा करने जाती थी। वे भारतवर्ष के हांसी प्रान्त से होकर जा रही थी। इस समय हान्सिपुर में नरवाहन नामक नागवंशी सरदार सूबेदार के पद पर नियुक्त था। जब उसकी सवारी दिल्ली राज्य के सरहद के पास पहुंची तब पृथ्वीराज के सामंतों ने उसे लूट लिया, पृथ्वीराज को इसकी खबर न थी, उनके सामंत ने सब धन लूटकर बेगमों को छोड़ दिया, शाहबुद्दीन की माँ गजनी लौट आई और सारा हाल शहाबुद्दीन गौरी को बता दिया, समाचार सुनकर गौरी अत्यंत क्रोधित हुआ और एक भरी सेना लेकर पृथ्वीराज से युद्ध करने निकल पड़ा। जब सेना हांसीपुर से दस कोश की दूरी पर रह गयी तब जाकर पृथ्वीराज के सामंतों को इसकी खबर मिली, चामुंडराय ने तुरंत ही किले की घेराबंदी कर ली और कई दिनों तक युद्ध चलता रहा, परन्तु हांसी के किले में किसी भी तरह यवनी का अधिकार नहीं हो पाया एक बार फिर चौहान सेना की वीरता के कारण यवनी सेना को मुंह की खानी पड़ी। जब ये समाचार गौरी को मिला तब वह स्वयं ही एक और बड़ी सेना लेकर आया, परन्तु पृथ्वीराज और समर सिंह ने उससे युद्ध कर उसे फिर से भगा दिया।

राजसूय यज्ञ

                                               राजसूय यज्ञ:-

 अब हमलोग कन्नोज की ओर झुकते है। जब जयचंद की उम्र सोलह वर्ष की थी तब उसके यहाँ चंद्रमा के सामान दीपवती कुमारी संयोगिता ने जन्म लिया। यह कन्या बहुत ही रूपवती थी। जब संयोगिता की उम्र बारह वर्ष की हुई तब जयचन्द राजसूये यज्ञ करने का विचार कर रहा था। बारह वर्ष की उम्र में ही सब कोई संयोगिता की सुन्दरता में मुग्ध रहते थे। जयचंद भी उससे बहुत प्यार करता था। जयचंद के लाड प्यार इतना बढ़ा चढ़ा था की संयोगिता दिनों दिन हठी बनाये जा रहा था। इस हठ का परिणाम क्या होगा इसका अंदाज़ा किसी को न था। बालुकराय जयचंद के भाई थे, जयचंद ने बालुकराय से परामर्श कर राजसूय यज्ञ करना चाहा। राजसूए यज्ञ में छोटे से बड़े सभी राजाओं को निमंत्रण देना होता है, इसलिए जयचंद ने विभिन्न प्रान्तों के राजाओं को एकत्र करने के लिए निमंत्रण पत्र भेजने का विचार किया। कन्नोज राजमहल में अतिथि सत्कार और दानपुण्य के लिए सभी सामग्रियां जुटायी जाने लगी। उस समय जयचंद के मंत्री सुमंत ने बहुत तरह से समझाने की कोशिश की किये करना उचित नहीं है, आजकल यज्ञ का सुचारू रूप से संपन्न होना संभव नहीं है व्यर्थ ही बैठे बिठाये विरोध बढ़ने की सम्भावना है। परन्तु जयचंद ने अपनी मंत्री की एक बात नहीं मानी बल्कि उसने अपने मंत्री को आदेश दिया की तुम पृथ्वीराज को ये पत्र लिखो की दिल्ली राज्य पर हमारा और तुम्हारा दोनों का अधिकार है इसलिए दिल्ली का आधा क्षेत्र हमें दे दो और यज्ञ में उपस्थित होकर यज्ञ का काम पूरा करो। यह बात सहज में में नहीं होने वाली थी । बहुत कुछ समझाने पर भी जब जयचंद नहीं माना तब जयचंद के मंत्री सुमंत खुद ही पृथ्वीराज से मिलने के लिए दिल्ली चले गए। सुमंत ने पृथ्वीराज को समझाया और यह निश्चय हुआ की सभी सामंत एकत्र होकर इस विषय पर विचार करेंगे। इधर जब ये सब बातें हो रही थी तब जयचंद का भेजा हुआ एक अन्य दूत राजसूये यज्ञ का निमंत्रण लेकर आ पहुंचा, निमंत्रण पत्र में लिखा था की तुरंत यहाँ आकर जयचंद की आज्ञा अनुसार राजसूए यज्ञ का जो भी कार्य सौंपा जाए उसका पालन कीजिये, पृथ्वीराज ने दूत को बहुत तरह से समझाया की इस समय जयचंद का राजसूये यज्ञ करना किसी भी तरह से उचित नहीं है इसलिए इस काम में वे हाथ न डाले,अतः तुमलोग जाकर अपने राजा को समझाओ। दूत और सुमंत वहां से लौट आये। सुमंत ने लौट कर फिर से समझाना चाहा परन्तु कौन सुनता है, इस समय तो जयचंद के माथे होनहार स्वर थी। उसे जब मालूम हुआ की पृथ्वीराज न ही दिल्ली का आधा राज्य देना चाहता है न ही उसका अधीनता स्वीकार कर राजसूए यज्ञ में शामिल होना चाहता है तो उसके क्रोध का सीमा न रही। उसने युद्ध विद्या विरासद बालुकराय और यवनी सेना प्रमुख खुरासान खां को बुलाकर राज्य की सुरक्षा का भार सौंपा और खुद ये विचार करने लगा की पृथ्वीराज को परास्तकर जबरदस्ती कैसे यहाँ लाया जाए, पर ये काम सोचने जितना सहज नहीं था, उपर से यज्ञ का समय निकल जाने का भी डर था। इसलिए उसने आज्ञा दी की पृथ्वीराज की सोने की प्रतिमा बनवाकर द्वार पर स्थापित कर दी जाए और यज्ञ का कार्य शुरू किया जाए, यही राय स्थिर हुआ और यज्ञ की तयारियां होने लगी। यह समाचार भी पृथ्वीराज के पास पहुंचा। पृथ्वीराज की प्रतिमा द्वारपाल के स्थान में रखे जाने का समाचार सुनकर पृथ्वीराज के सभी सामंत क्रोध से अधीर हो उठे, उन्होंने अपने महाराज का अपमान होते देख क्रोध पुर्वक पृथ्वीराज से युद्ध की अनुमति मांगी, उन सबने एक स्वर से कहा की हमें कन्नोज में इसी वक़्त आक्रमण कर यज्ञ को विध्वंस कर देना चाहिए, परन्तु सेनापति कैमाश ने कहा की की अभी कन्नोज से युद्ध करने का सही अवसर नहीं है जयचंद का बल बहुत ही बढ़ा चढ़ा है और इसके साथ ही कन्नोज में छोटे बड़े नृपति भी उपस्थित है, इसलिए हमें खोखंदपुर में हमला कर जयचंद के भाई बालुकराय को मार डालना चाहिए उसके मौत से जयचंद को भरी सदमा लगेगा और यज्ञ स्वयं ही विध्वंस हो जायेगा, पृथ्वीराज ने कैमाश की बात मान लिए, और बालुकराय को मारने के लिए चल दिए। जैसे ही पृथ्वीराज की सेना ने कन्नोज में कदम रखा वैसे ही खोखंदपुर में चरों ओर हाहाकार मच गया, सारे गांव को उजाड़ा जाने लगा, जमींदार पकडे जाने लगे, चौहान सेना के इस उपद्रव से परेशान होकर प्रजा ने बालुकराय से फ़रियाद की। बलुकराय बहुत वीर था, उसने ये समाचार सुनकर पृथ्वीराज को राज्य में उपस्थित होने से पहले ही रोकना चाहा। युद्ध की तयारियां होने लगी । बलुकराय की सेना ने चौहान सेना को चारों ओर से घेर लिया, बहुत ही भयानक युद्ध होने लगा, बलुकराय इस समय अपने हाथी में बैठकर युद्ध कर रहा था, उसका हाथी ने चौहान सेना को रौंदने लगा था ये देखकर चौहान सेना थोड़ी विचलित हुई पर पृथ्वीराज चौहान ने उसके हाथी पर एकाएक ऐसा वार किया की उसका हाथी कराहकर जमीन में गिर गया, हाथी के गिरते ही चौहान सेना बलवती हो उठी और दुगुने जोश से लड़ने लगी, बालुकराय हाथी के गिरने पर स्वयं भी जमीन पर गिर पड़ा, लड़ते लड़ते उसका सामना कान्हा से हो गया, कान्हा ने बालुकराय पर ऐसा वार किया की उसका सर धड से अलग हो दूर जा गिरी, बालुक राय के मरते ही सेना विचलित हो उठी और रणक्षेत्र से भाद खड़ी हुई। इस युद्ध में बालुकराय के पांच हज़ार और पृथ्वीराज के तेरह सौ सिपाही मारे गए। संग्राम में शत्रु सेना को परास्त का पृथ्वीराज खोखंदपुर को लूटने के लिए अग्रसर हुए।और उसे लूटकर दिल्ली लौट आये। उन्होंने अपने अपमान का बदला जयचंद से इस प्रकार लिया।

दिल्ली में आक्रमण

                                                   दिल्ली में आक्रमण :-

पृथ्वीराज के शाषणकाल में दिल्ली सुख और समृद्धि से फल फूल रही थी। मुहम्मद गौरी बार बार पृथ्वीराज पर आक्रमण करता और उसे मुंह की खानी पड़ती। मुहम्मद गौरी समझ चूका था की पृथ्वीराज चौहान से सीधे सीधे नहीं जीता जा सकता है इसलिए उसने शस्त्र युद्ध के बदले कूटनीति से कार्य करना आरंभ किया,उसने अपने कुछ आदमियों को दिल्ली में भेजकर दिल्ली में जगह जगह कोहराम मचाना शुरू कर दिया। दिल्ली की सेना जब तक उनतक पहुँचति तबतक वो लोग वहां से लूटमार कर भाग जाते और फिर दूसरी जगह लूट मार करते। दिल्ली की प्रजा का सुख दिनों दिन खोता जा रहा था, और अन्दर ही अन्दर उनमे पृथ्वीराज के प्रति दुर्भावना आती जा रही थी की हमारे महाराज कुछ नहीं कर रहे है। परन्तु सच्चाई कुछ और ही थी पृथ्वीराज हर तरह से उनकी मदद कर रहे थे। अब मुहम्मद गौरी के आदमियों ने अनंगपाल के पास जाकर फरियाद की, कि आपने अपना राज्य एक गलत और अनुपयुक्त पुरुष के हाथों में दे दिया है कृपया आप अपना राज्य अपने हाथों में वापस ले ले। पृथ्वीराज तरह तरह से अपनी प्रजा को कष्ट पहुंचा रहा है, आपकी प्रजा पीड़ित हो रही है,अतः आप वापस चलकर अपना राज पाट अपने हथिन में वापस ले ले। शाहबुद्दीन के पक्षपात धर्मयन ने कुछ लोगो को अपने साथ मिला कर अनंगपाल को ऐसा दिखाया की उन्हें लगे की पृथ्वीराज की प्रजा सही में उनसे दुखी है, अनंगपाल मुहम्मद गौरी की चाल को समझ न पाए, और उन्हें उसकी बातों पर यकीन हो गया। अनाग्पाल ने पृथ्वीराज को एक पत्र लिखकर अपना राजपाट वापस माँगा और दिल्ली राज्य छोड़ देने को कहा, परन्तु हाथ में गया हुआ राजपाट इतनी आसानी से कौन दे सकता है, पृथ्वीराज को मुहम्मद की चाल का भनक मिल गयी थी अतः पृथ्वीराज ने राजपाट लौटने से साफ़ इंकार कर दिया। अनंगपाल के तपोस्वी वन जाने पर भी उनके पास पक्षपातियों की कमी न थी, अनंगपाल ने अनायास ही थोड़ी सेना बटोर ली और दिल्ली में आक्रमण कर दी, पृथ्वीराज चौहान बहुत फेर में पड़ गए, वे सोचने लगे की एक तो अनंगपाल रिश्ते में नाना लगते है और उपर से इतना बड़ा राजपाट और इतना बड़ा राज्य तो उनका ही दिया हुआ है वे उनसे युद्ध कैसे कर सकते है। अतः पृथ्वीराज ने किले का द्वार बंद करने का आदेश दे दिया और ये भी कहा की चौहान सेना एक भी सैनिक को हाथ नहीं लगाएगी, ऐसा ही हुआ, अनाग्पाल ने पृथ्वीराज के किले में हमला किया और पृथ्वीराज किले का दरवाजा बंद कर केवल आत्मरक्षा करने लगे। लाचार होकर अनंगपाल को लौट जाना पड़ा। शाहबुद्दीन गौरी अपने कार्य साधन के लिए इस समय को उपयुक्त समझा। उसने हरिद्वार में अपना एक दूत भेजकर अनंगपाल को कुछ प्रलोभन देकर अपने साथ मिला लिया। मुहम्मद गौरी के संपर्क में अनाग्पाल की बुद्धि भ्रष्ट होती ही जा रही थी। अनंगपाल ने दिल्ली के कुछ इलाकों में अपना कब्ज़ा करना शुरू कर दिया था। अनाग्पाल एवं उनके कुछ सैनिकों की सहायता लेकर गौरी दिल्ली में आक्रमण कर दिया। इस बार यवनी सेना को आक्रमण करता देख पृथ्वीराज चौहान शांत न रह सके उन्होंने आगे बढ़कर उन्हें दंड देना उचित समझा, उन्होंने अनंगपाल का तो ध्यान ही छोड़ दिया था। मुहम्मद गौरी को दंड देने के लिए महल का दरवाजा खोल दिया गया। इस बार ततार खां मुहम्मद गौरी का प्रमुख सेनापति बनकर आया था।पृथ्वीराज ने अपने सेना को अनंगपाल को जीवित पकर लेने की आज्ञा दी थी। बहुत ही भयानक युद्ध होने लगा। मुहम्मद गौरी के वीर सरदार मारुफ़ खां,ततार खां,खुरासान खां, आदि योद्धाओं ने अपने अपमान का बदला लेने में कोई कसर न रखी, वे इस तरह से राजपूत की सेना में टूट पड़े जैसे की भेंड के झुण्ड में मृगराज टूटता है, परन्तु जिन्हें वो भेंड समझ रहे थे वास्तव में वो शेर थे। चौहान सेना के वीरों ने मुसलमानों का इस ख़ूबसूरती से सामना किया की दुशमन अपनी शान भुलाकर अपनी औकात में आ गए,खून की नदियाँ बहने लगी, लड़ते लड़ते दोनों ओर की सेना मदमत हो गयी, परन्तु भारत में अभी मुसलमानों के शासन में विलम्ब था, पृथ्वीराज की दहाड़ और हिन्दू सेना की हुंकार सुनते ही दुश्मनों के रूह तक काँप उठे थे, वे विचलित होकर इधर उधर भागने लगे, पृथ्वीराज चौहान ने यवनी सेना में ऐसा तहलका मचाया की वो भागने को मजबूर हुए, जल्द ही मुहम्मद गौरी के सेना को हारना पड़ा। चामुंडराय ने मुहामद गौरी को पकड़ लिया और कैदखाने में डाल दिया, अनंगपाल को भी पकड़ लिया गया और पुरे सम्मान पुर्वक महल में रखा गया। पृथ्वीराज सभी कामों से निश्चिंत होकर दरबार में विराजे। सेनापति कैमाश ने मुहम्मद गौरी को पृथ्वीराज के समक्ष प्रस्तुत किया पृथ्वीराज ने बहुत कुछ समझा कर, और कुछ धन देकर उसे छोड़ दिया।
इधर अनंगपाल ने एक वर्ष तक महल में आराम से रहे। इसके बाद अनंगपाल की रानियों ने उन्हें समझाया की आप व्यर्थ ही किसी के बहकावे में आकर अपना राजपाट सब नष्ट करने में लगे है क्या आपको दिल्ली की प्रजा को देखकर लगता है की वो पृथ्वीराज से दुखी है, अगर आपको राज करने का मन था ही तो फिर पृथ्वीराज को दिल्ली का राजगद्दी क्यों सौंपा। अनाग्पाल को उसके अपनी की बातें भा गयी, उन्हें अपने किये पर पछतावा होने लगा, और उन्हें पृथ्वीराज के सामने लज्जित महसूस होने लगी। अतः अब उन्हें दिल्ली में रहना उचित नहीं लगा और फिर बदरिकाश्रम की ओर प्रस्थान कर दिए। पृथ्वीराज ने स्वयं ही उनको बदरिकाश्रम तक पुरे सम्मान से पहुंच आये। इसी समय उनके बढ़ते प्रताप के कारण कई राजाओं ने उनके समक्ष शरणागत हो रहे थे, इनमे ही दक्षिण प्रान्त के कई नृपतिगण थे, वे उपहार के रूप में पृथ्वीराज को कई चीजे देते रहते थे। उन्होंने मिलकर कर्नाटकी नाम की एक बहुत सुन्दर कन्या पृथ्वीराज को अर्पण की। कर्नाटकी भी पृथ्वीराज के जीवन में एक अनर्थ का जड़ रही थी। इसने भी भारत में विद्वेष फ़ैलाने में कम सहायता नहीं की है इसी के कारण पृथ्वीराज के घर में फूट रूपी बीज बोया जा चूका था। पृथ्वीराज चौहान ने यहाँ पर गलती कर दी थी की इस कर्नाटकी को उन्होंने अपने महल में स्थान दे दी थी। चंदरबरदाई ने कहा है की पृथ्वीराज के बढ़ते वैभव के कारण भारत के दक्षिण प्रान्त के राजा पृथ्वीराज से भय खाने लगे थे इसलिए उन्होंने आपस में सलाह कर विद्वेष फ़ैलाने वाली यह कर्नाटकी नामकी एक बड़ी रूपवती, गान विद्या में निपुण तथा विचक्षण हावभाव संपन्न रमणी पृथ्वीराज को अर्पण की। अभी कर्नाटकी की अवस्था छोटी थी अतः पृथ्वीराज ने कल्हण नाम के नटके को सौंप दिया और कह दिया की इसे गान-नृत्य की शिक्षा में निपूर्ण कर दिया जाए। वैश्या की पुत्री होने के कारण वह इन सब को आसानी से समझती थी, वह शीघ्र ही इन सब में निपुण हो गयी और मौका देखते ही कल्हण ने इसे पृथ्वीराज को सौंप दिया, पृथ्वीराज ने उसकी योवन अवस्था को देखकर महल में डाल लिया।

भानराय का पृथ्वीराज से द्वेष

                                                 भानराय का पृथ्वीराज से द्वेष:-

इधर पृथ्वीराज शाशिवृता को ले दिल्ली आ पहुंचे और वीरचन्द्र ने पृथ्वीराज से हार का बदला भानराय से लेने की ठानी। उसने भानराय के किले को चारों ओर से घेर लिया और कुछ सेना और भेजने के लिए जयचंद को पत्र लिखा। भानराय ने जब अपने को घिरा पाया तो पृथ्वीराज को पत्र लिखा की आपके कारण ही मेरे उपर इतनी बड़ी विपदा आई है इसलिए इस समय आप मेरी रक्षा कीजिये। इसी समय वीरचंद का दूत पत्र लेकर जयचंद के पास पहुंचा और पत्र के अतिरिक्त उसने जबानी ही सारा हाल जयचंद्र को बता दिया, जयचंद्र पहले से ही दिल्ली का राज सिंहासन न मिलने के कारण पृथ्वीराज से क्रोधित था अब तो वो और भी क्रोधित हो गया, उसने तुरंत ही वीरचंद को अपनी सहायता पहुंचाई।
जयचंद ने तुरंत ही अपने सभी मंत्रियों को बुलाकर ये परामर्श करने लगा की अपने सभी अधीन राजाओं और सामंतों को सभी सेना समेत कन्नोज बुला लिए जाए वे राजसूय यज्ञ करेंगे।
दुसरे ही दिन सवरे से ही कन्नोज में सेना एकत्र होने लगी। जयचंद्र के अधीन राजाओं की सेना भी उनमे आकर सम्मिलित होने लगी। उनकी सेना ध्वजा लिए आगे आगे चलने लगी और उस ध्वजा के पीछे पीछे वीर योद्धा चलने लगे। इसी समय नरवर के राजा का छोटा भाई अमरसिंह और दीर्घकाय महाबलशाली पंगुराय भी अपनी सेना लेकर जयचंद के सेना में सम्मिलित हो गया। इस तरह जयचंद की विशाल सेना भानराय और पृथ्वीराज से बदला लेने के लिए चल पड़ी। जब भानराय द्वारा लिखा पत्र पृथ्वीराज को मिला तो उन्होंने भानराय की मदद करना अपना कर्तव्य समझा और तुरंत ही पृथ्वीराज ने समरसिंह को पत्र लिख कर कहा की इस समय आपको हमारी मदद अवश्य ही करनी चाहिए, समर सिंह ने सहर्ष ही पृथ्वीराज की प्राथना स्वीकार कर ली। समर सिंह को पहले से ही पता था की यवनी सेना पृथ्वीराज पर फिर से आक्रमण करना चाहती है इसलिए समरसिंह ने पृथ्वीराज से कहा की आप दिल्ली न छोड़े,आप दिल्ली की सुरक्षा के लिए वहीँ रहे और आप अपने कुछ सामंत हमारे साथ कर दे भानराय की सहायता हम कर लेंगे। पृथ्वीराज ने समरसिंह की बात मान ली। उन्होंने अपने सामंत चामुंडराय और जैतसी को समरसिंह के पास भेज दिया और स्वयं दिल्ली में रुक गए। समरसिंह ने अपने भाई अमरसिंह को भानराय की सहायता के लिए देवगिरी भेज दिया, इधर वीरचंद भानराय का किला को घेराबंदी किये बैठा था पर अबतक कुछ कर नहीं पाया था। चामुंडराय ने रात्रि के समय जाकर वहां आक्रमण कर दिया, एक तो वर्षा की अंधकारमयी रात्रि के कारण वीरचन्द्र की सेना पहले से ही विचलित हो रही रही थी, जब जल की वर्षा के साथ तीरों की वर्षा भी होने लगी तो वीरचन्द्र की सेना और भी घबरा गयी। इतना सब कुछ होने पर भी उसकी सेना ने रणक्षेत्र नहीं छोड़ा, दोनों दलों में घोर युद्ध होने लगा। इसी बीच समरसिंह की सेना लिए उसका भाई अमर सिंह युद्ध मैदान में आ गए और चामुंडराय की मदद करने लगे, युद्ध और भी भीषण होने लगा। जयचंद को हर समय का समाचार लगातार मिल रहा था, वीरचंद की सेना की हार से पहले ही वो रणक्षेत्र में पहुँच कर किला में अधिकार करना चाहता था, इसलिए वो और भी वेग से आगे बढ़ा। जब वह वहां पहुँच कर देखा तो पता चला की किला बहुत लम्बा चौड़ा और खाई से घिरा हुआ है तब उसे लाचार होकर वहीँ पड़ाव डालना पड़ा। जयचंद बहुत ही कूटनीतिज्ञ था, उसने राजनीतिज्ञ चालो द्वारा वहां के रक्षको को घूस देकर अपने साथ मिलाना चाहा पर ऐसा न हो पाया। तब उसने दुसरे ढंग की चाले चला। उसने किला में सुरंग लगाने की आज्ञा दी,परन्तु किले की खाई इतनी गहरी थी की उसकी ये चेष्टा भी निष्फल हुई, अब उसके तीनो राजनीतिज्ञ शस्त्रों साम,दाम,दंड, निष्फल हो गए थे अब आखिरी शास्त्र भेद की बरी थी, उसने एक दूत को राजा भानराय के पास भेजकर ये सन्देश भेजवा दिया की आप मेरे साथ मिल जाईये ताकि हम मिलकर पृथ्वीराज से आपके अपमान का बदला ले सके, भान राय ने अपने मंत्री से जब इसकी सलाह ली तो उसके मंत्री ने कहा की हमें जयचंद के इस चाल में नहीं आना चाहिए पृथ्वीराज से बैर करना उचित नहीं होगा अपने मंत्री की दूर दर्शिता को देखकर वो बहुत खुश हुआ और भानराय ने जयचंद के साथ मिलने से इनकार कर दिया। जब जयचंद लाचार होकर किले पर अपना अधिकार नहीं जमा पाया तब उसने देवगिरी में लूटपात मचाना शुरू कर दिया। और अनेक स्थानों में अपना शाषण फैलाना भी शुरू कर दिया, परन्तु चामुंडराय और अमरसिंह के सेना ने उसके इस कार्य में उसे तंग करने लगी। अपने राज्य से इतनी दूर आकर जयचंद वास्तव में मुसीबत में फंस गया था क्योंकि वो देवगिरी के इलाकों में अपना अधिकार तो कर लेता पर जयादा समय तक उसका उचित प्रबंध न कर पाता, इसप्रकार से चामुंड राय और अमरसिंह के द्वारा उसके कितने ही सेना मारे गए। जयचंद्र के सामंतों ने उसे ये बात समझाई की अगर आप देवगिरी में विजय प्राप्त कर भी लेते है तो आप अपना प्रभुत्व अपने राज्य से दूर होने के कारण यहाँ कायम नहीं रख पाएंगे, ये युद्ध शाशिविता के लिए थी, पृथ्वीराज तो उसे ले गए अब व्यर्थ ही नरसंहार करने की कोई आवश्यकता नहीं है। मंत्रियों की ये बात जयचंद के मन में भा गयी, उसने उस समय अपने सभी सेना को कन्नोज वापस चलने की आज्ञा दे दी। इस तरह से देवगिरी का युद्ध समाप्त हो गया।

शशिवृता


                                                              शशिवृता:-

खजाना निकालने का काम अभी समाप्त होते ही समर सिंह चितोड़ और पृथ्वीराज दिल्ली पधारे। इसके कुछ दिन के बाद ही पृथ्वीराज को ये खबर मिली की देवगिरी के राजा भानराय यादव की पुत्री शाशिव्रिता अनुपम सुंदरी है। भानराय अपनी कन्या का विवाह जयचंद के भतीजे वीरचंद से करवाना चाहता था, इसलिए उसने एक ब्राह्मण के द्वारा एक टिका भेज दिया था, ब्राह्मण टिका लेकर कन्नोज चला गया। परन्तु इधर शशिवृता पृथ्वीराज की प्रशंसा सुनकर मन ही मन मुग्ध हो रही थी। ये सब समाचार पृथ्वीराज को मालूम थे। जब विवाह का दिन निकट आया तो वीरचंद कन्नोज से अपनी सेना एवं सामंतों के साथ विवाह के लिए चल पड़ा। तब पृथ्वीराज भी अपनी दस हज़ार सेना और बड़े बड़े सामंतों को लेकर अपनी प्रेम पिपासा को शांत करने के लिये अग्रसर हुए। इस बार बहुत भयानक युद्ध की सम्भावना थी।
जब शाशिवृता के मन का हाल उनके माता पिता को पता चला तो उन्होंने उसे बहुत समझाना चाहा पर शाशिवृता उनकी एक न सुनी, यह देखकर देवगिरी के राजा ने अपने मंत्री से परामर्श लिए उसके मंत्री ने सुझाव दिया की आप अपनी पुत्री का विवाह वीरचंद से ही करें क्योंकि आप टिका भेजवाकर वचन दे चुके है। पर अपने पुत्री के मोह वश वे ऐसा न कर पाए, उन्होंने पृथ्वीराज को एक पत्र लिखकर ये बता दिया की शाशिवृता शिवालय में रहेगी आप उसे वहां से आकर ले जाए। जब पृथ्वीराज को ये खबर मिली तो उन्होंने अपनी सेना का भार कान्हा चौहान को दे दिया और स्वम नित्ठुर राय और यादवराय के साथ देवगिरी जा कर घूमने लगे। जब पृथ्वीराज घुमते हुए किले के निचे पहुंचे तो शाशिवृता ने उन्हें देख लिया और दोनों की आंखे चार हो गयी,शाशिवृता ने अपने पिता से आज्ञा लेकर शिवालय चली गयी। उस समय शाशिवृता के साथ वीरचंद और शाशिवृता के पिता की सेना थी, इसलिए पृथ्वीराज ने बुद्धि से काम लेना उचित समझा, उन्होंने अपने सिपाहियों को योगियों के भेष में मिल जाने की आज्ञा दी यही हुआ। अस्त्रों को गुप्त रूप से छिपाते हुए पृथ्वीराज की सेना वीरचंद और भानराय के सेना में सम्मिलित हो गयी। इधर पृथ्वीराज एक सुन्दर सा घोडा लेकर मंदिर के पास आ पहुंचे, जब शाशिवृता मंदिर से पूजा कर निकली पृथ्वीराज ने शाशिवृता को सीडी पर से ही उसके करकमलों को पकड कर घोड़े पर बिठा लिया। शाशिवृता को लेकर भागते हुए वीरचंद के सेना ने पृथ्वीराज को देख लिया अब शाशिवृता के कारण एक बहुत बड़ा युद्ध होने वाला था। वीरचंद की सेना हुंकार उठी एक और जहाँ मंदिर के सामने मग्न करने वाली ध्वनि बज रही थी वहीँ वो ध्वनि युद्ध के बाजों और बिगुल में बदल गयी,जयचंद्र का भतीजा कम्धुन्ज वीरचंद केसरिया बंगा पहने, शस्त्र बंधे शिवदर्शन को आ रहा था, शाशिवृता को इस तरह हरण होते देख, उसने अपनी तलवार निकाल पृथ्वीराज की ओर झपटा, उसने सुन्दरी शाशिवृता को छीन लेना चाहा, तुरंत ही पृथ्वीराज के सामंत और सेना ने अपनी कपट भेष को फेंक कर अपने शस्त्र निकाल लिए। मंदिर के पास ही मार काट मच गयी। किसी तरह शाशिवृता को लेकर पृथ्वीराज अपने सेना के पड़ाव में आ गए। अब क्रमवध युद्ध होने लगा। बहुत भयानक युद्ध होने लगा। यद्यपि भानराय ने पृथ्वीराज को पात्र लिखकर अपनी पुत्री को उन्हें सौंपना चाहा था पर वो अपनी इज्जत बचाने के लिए वीरचंद के साथ हो लिया। संध्या होना चाहती थी पर सैनिकों में विराम न था, इसी बीच शाशिवृता का भाई मारा गया, राजा भान राय ने पृथ्वीराज से अपनी हार मानकर अपनी सेना वापस मंगवा ली, पर वीरचंद ने हार नहीं मानी। दुसरे दिन फिर युद्ध शुरू हो गया, आज के युद्ध में वीरचंद का वीर सहचर ख़ोज खवास मारा गया, उसकी मृत्यु से वीरचंद को बहुत दुःख हुआ, साथ ही उसे कुछ भय भी था इसलिए वो अपने सामंतों से विचार करने लगा की क्या करना उचित होगा। उसके सामंतों ने इस युद्ध का घोर विरोध किया और वीरचंद से कहा की एक स्त्री के लिए हज़ार सिपाहियों का बलिदान देना बिलकुल भी उचित नहीं होगा अतः इस युद्ध को यही समाप्त कर देना उचित रहेगा। वीरचंद ने उनकी बात मान ली और अपने सेना को पीछे हटने का आदेश दे दिया वीरचंद की सेना जैसे ही पीछे हटने लगी पृथ्वीराज के सेना को लगा की वो हमसे डर कर भाग रही है और पृथ्वीराज की सेना ने और भी वेग से आक्रमण कर दिया, वास्तव में वीरचंद की सेना का बल कम नहीं हुआ था, तुरंत ही उसकी सेना फिर से अपने स्थान में डट कर खड़ा हो गयी और फिर से युद्ध करने लगी, शाम होने वाली थी। वीरचंद के मस्तक में हमेशा एक चांदी का छत्र लगा रहता था, पुंडीर ने उस वीरचंद पर एक ऐसा वार किया की उसका छत्र दूर जाकर गिर गया, छत्र के गिरते ही उसकी सेना में कोलाहल मच गया वीरचन्द्र भी बहुत भयभीत हो गया, थोड़ी देर में ही रात हो गयी और युद्ध विराम हो गया। वीरचंद और पृथ्वीराज ने अपने अपने सामंतों से विचार करने लगे। पृथ्वीराज के सामंतों ने अपना मत दिया की आप शाशिवृता को लेकर दिल्ली चले जाईये हम यहाँ संभाल लेंगे पृथ्वीराज ने कहा की इसतरह हम आपलोगों को मुसीबत में छोड़ कर दिल्ली जाकर आनंन्द नहीं मना सकते है, सभों के समझाने पर भी पृथ्वीराज ने एक न सुनी अन्त में सभों को चुप होना पड़ा, सुबह होते ही युद्ध का बिगुल बज उठा, आज का युद्ध में निट्टूराय को सेनापति बनाया गया। घोर युद्ध होने लगा। पृथ्वीराज घोड़े में बैठकर इस तरह वीरचंद के सेना को काट रहे थे जैसे उनका काल उनके सामने हो, कोई भी उनके पास आने से पहले एक बार अवश्य सोच रहा था, शाम होने से पहले ही वीर पुंडीर ने वीरचंद को बंदी बना लिया पर पृथ्वीराज ने कहा की अपना काम हो गया अब उसे बंदी बनाने से कोई फायदा नहीं और पृथ्वीराज ने वीरचंद को छोड़ देने का आदेश दिया। इस तरह पृथ्वीराज ने हजारों मनुष्यों की बलिदान देकर शाशिवृता को अपना पत्नी बनाया और दिल्ली आ पहुंचे।